सृष्टिधर महतो

सृष्टिधर महतो : पंचपरगनिया साहित्य का सशक्त स्तंभ

जन्म और शिक्षा

आधुनिक रचनाकारों में सृष्टिधर महतो का नाम पंचपरगनिया भाषा साहित्य में अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है।  

01 अगस्त 1938 ई. को सिल्ली परगना के हाजाम गाँव (पोस्ट-बन्ता, थाना-सिल्ली) में उनका जन्म हुआ। माता का नाम स्व. कलावती महतो और पिता का नाम स्व. नीलकंठ महतो था। पिता एक गरीब किसान थे, किंतु उन्होंने अपने पुत्र को पढ़ाने की प्रबल इच्छा रखी। सृष्टिधर महतो बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी थे। आगे चलकर उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र (ऑनर्स) में बी.ए. की डिग्री प्राप्त की।  

साहित्यिक योगदान

1982-83 में वे ‘पंचपरगनिया भाषा विकास समिति’ से जुड़े और गद्य-पद्य दोनों विधाओं में लेखन प्रारंभ किया।  

- गद्य रचनाएँ: डभा केर फुल (एकांकी), जुलूम (नाटक), पंचपरगनिया निबंध संग्रह, चरित्र निर्माण टा देस के आधुवाए पारेला।

- पद्य रचनाएँ: नावा जागरन, झागड़ा, सावन मास।  

उनका नाटक “जुलूम” पंचपरगनिया भाषा का पहला नाटक माना जाता है। इसमें उन्होंने जमींदारी वर्चस्व और अंधविश्वास का तीव्र विरोध किया। पात्र चयन, संवाद और घटनाओं का संयोजन इतना सशक्त है कि पाठक पूरी तरह बाँध जाता है।  

अन्य भाषाओं में लेखन

सृष्टिधर महतो ने बांग्ला भाषा में भी अनेक नाटक लिखे, जिनका मंचन समय-समय पर होता रहा। दुर्भाग्यवश उनकी कई पांडुलिपियाँ अब तक अप्रकाशित हैं। राहत की बात यह है कि “जुलूम” नाटक 2017 में ‘झारखंड झरोखा’ द्वारा प्रकाशित किया गया। उनकी अन्य रचनाएँ आज भी आई.ए., बी.ए. और एम.ए. पाठ्यक्रम में पांडुलिपि रूप में पढ़ाई जाती हैं।  

व्यक्तित्व और सांस्कृतिक सेवा

सृष्टिधर महतो का स्वभाव मृदुभाषी था। वे बच्चों को स्नेहपूर्वक बुलाते और सभी को सम्मान देते। उन्होंने पंचपरगनिया गीत और झुमइर के प्रचार-प्रसार में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। समिति के कलाकारों के साथ मिलकर उन्होंने साहित्य सृजन, गीत-संगीत के कैसेट निर्माण और प्रचार-प्रसार में सहयोग दिया।  

प्रसार और सम्मान

उनकी रचनाएँ आकाशवाणी राँची से प्रसारित होती रहीं। पंचपरगनिया पत्रिका “बिहान” में भी उनके आलेख प्रकाशित हुए। अधिक उम्र होने के बावजूद वे आज भी साहित्य सृजन में सक्रिय हैं। 

2008 में कला एवं संस्कृति विभाग की संगोष्ठी में तत्कालीन शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की और शिक्षाविद् स्व. रामदयाल मुण्डा ने उन्हें संयुक्त रूप से सम्मानित किया।  

विरासत

सृष्टिधर महतो का पूरा जीवन पंचपरगनिया भाषा की सेवा और विकास के लिए समर्पित रहा है। वे वास्तव में पंचपरगनिया साहित्य के एक मजबूत स्तंभ हैं और “पाँचपरगना की आन-बान और शान” कहलाने योग्य हैं।  


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