हरदयाल पांडेय : पंचपरगनिया साहित्य के आधुनिक गद्यकार
प्रारंभिक जीवन और जन्म
7 अगस्त 1939 ई. को बुंडू परगना के गोसाईंडीह गाँव में हरदयाल पांडेय का जन्म हुआ। उनके पिता खेतर मोहन और माता चामी देवी थीं। बचपन से ही उनकी बुद्धि प्रखर थी और पढ़ाई-लिखाई में गहरी रुचि रखते थे। पंचपरगनिया भाषा में उनकी रचनाएँ संख्या में कम हैं, किंतु जो उपलब्ध हैं वे साहित्य के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुईं। जब आधुनिक पंचपरगनिया साहित्य अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत था, तब उनकी रचनाओं ने इसे नई पहचान दी।
शिक्षा
प्रारंभिक शिक्षा काँची मिडिल स्कूल से हुई। आगे की पढ़ाई उन्होंने बुंडू के लक्ष्मी नारायण हाई स्कूल से की और यहीं से मैट्रिक उत्तीर्ण किया। उस समय यह क्षेत्र का एकमात्र हाई स्कूल था। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी और बिहार की एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी से आई.ए. और बी.ए. की डिग्री प्राप्त की।
करियर और सरकारी सेवा
- 1956 ई. में धनबाद के खरनी गाँव के बुनियादी विद्यालय में सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्ति।
- शीघ्र ही हेडमास्टर बने और शिक्षा में नए प्रयोग किए।
- 1982 ई. में बुंडू के प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति।
- 1994 ई. में जमशेदपुर में शिक्षा उपाधीक्षक बने।
- 1995 ई. में क्षेत्रीय शिक्षा पदाधिकारी का पद संभाला।
- 1997 ई. में जगन्नाथपुर, टाटा नगर में पदस्थापित होकर सेवानिवृत्त हुए।
सरकारी सेवा के दौरान वे छात्रों और समाज के बीच अत्यंत लोकप्रिय रहे।
पंचपरगनिया साहित्य में योगदान
1989 ई. में वे पंचपरगनिया भाषा विकास समिति से जुड़े। उन्होंने लेखन में एकरूपता लाने पर बल दिया।
उनका आलेख “पंचपरगनिया भासा के केसन लिखब, पढ़ब आर कहब” पत्रिका बिहान में प्रकाशित हुआ, जिसने साहित्यकारों को एकरूपता की दिशा दी। बाद में वे समिति के अध्यक्ष बने और भाषा-संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
साहित्यिक दृष्टिकोण और दर्शन
उनका लेख “भारत की संस्कृति: सुर, असुर और राक्षस” पत्रिका बिहान में प्रकाशित हुआ। उनकी लेखन शैली वैज्ञानिक और गहन विश्लेषणात्मक थी। वे तुलसीदास की रामायण को जीवन की सात सीढ़ियाँ मानते थे और इसे धार्मिक ग्रंथ से अधिक जीवन का मार्गदर्शक समझते थे। छोटी-छोटी बातों में गहरे अर्थ खोज लेना उनका विशेष गुण था।
निधन और विरासत
2004 ई. में उनका निधन हुआ। यह पंचपरगनिया साहित्य और संस्कृति के लिए अपूरणीय क्षति थी। वे अनेक शोध और खोज कार्यों में संलग्न थे, जो अधूरे रह गए। हरदयाल पांडेय का योगदान पंचपरगनिया साहित्य को आधुनिक पहचान देने वाला रहा और आने वाली पीढ़ियाँ उनके कार्यों से प्रेरणा लेती रहेंगी।
