राजकिशोर सिंह

राजकिशोर सिंह : पंचपरगनिया साहित्य और संस्कृति के स्तंभ


परिचय और प्रारंभिक जीवन

13 अक्टूबर 1956 को झारखंड के बुंडू गाँव में राजकिशोर सिंह का जन्म हुआ। पिता का नाम स्व. राधागोविंद सिंह और माता का नाम स्व. राधा रानी सिंह था। संयोगवश तीनों की राशि ‘तुला’ थी। प्रारंभिक शिक्षा गाँव के विद्यालय से हुई और आगे की पढ़ाई पंचपरगना किसान महाविद्यालय से इंटरमीडिएट तक पूरी की। कम उम्र में ही परिवार का बोझ उठाने के कारण वे उच्च शिक्षा आगे नहीं बढ़ा सके, किंतु पढ़ने-लिखने और सीखने की ललक सदैव बनी रही। बांग्ला परिवेश में पले-बढ़े होने के बावजूद उन्होंने पंचपरगनिया भाषा को अपनी लेखनी का आधार बनाया और इसके साहित्य को नई दिशा दी।  

भाषा और संस्कृति के प्रति योगदान

राजकिशोर सिंह केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के संस्कृति कर्मी भी हैं। उन्होंने पंचपरगनिया लोक संगीत को अंधकार से निकालकर जन-जन तक पहुँचाया। वे हिंदी, बांग्ला, पंचपरगनिया और नागपुरी-सादरी भाषाओं के जानकार हैं तथा कुरमाली और खोरठा में भी रुचि रखते हैं। उन्होंने “पंचपरगनिया भाषा विकास केन्द्रीय समिति” और “स्वर संगम” जैसी संस्थाओं की स्थापना कर साहित्य और संगीत को संगठित किया।  

कविता और पद्य साहित्य

उनकी कविताओं में राष्ट्रभक्ति, सामाजिक चेतना और जन-जागरण की गूँज सुनाई देती है।  
- मुक्त छंद का पहला प्रयोग: एकटा अनुभब  
- अमात्रिक छंद की पहली रचना: दरद  
- पंचपरगनिया का पहला महाकाव्य: सिबुबारात (शिव बारात), जिसमें 9 खंड और चार छंदों का प्रयोग किया गया है।  
- रामचरितमानस का अनुवाद: ‘बालकांड’ का पंचपरगनिया में अनुवाद उसी छंद में किया गया, जिसका प्रयोग तुलसीदास ने किया था।  

उनकी कविताएँ 1983 से बिहान पत्रिका में प्रकाशित होने लगीं। 1990 में परमानन्द महतो द्वारा संकलित पुस्तक जीबन पथेक फुल में उनकी 16 कविताएँ शामिल की गईं। 2012 में उनकी पहली स्वतंत्र पुस्तक “नावा सोंच” प्रकाशित हुई, जिसमें 20 कविताएँ संकलित हैं।  

गद्य साहित्य में योगदान

गद्य साहित्य में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है।  
- पहला पंचपरगनिया उपन्यास: ईंजत (उजाला), जिसमें सामाजिक रूढ़ियों और भेदभाव के विरुद्ध विद्रोह है।  
- अन्य उपन्यास: मां माटी मानूस  
- निबंध संग्रह: तुलसी चउरा, जिसमें 25 निबंध संकलित हैं।  
- नाटक: चेंग मुड़ी कानि, जो मनसा माता पर आधारित है और अंधविश्वास व सामाजिक विकृतियों पर प्रहार करता है।  

सांस्कृतिक और सांगीतिक साधना

पूरे पंचपरगना क्षेत्र में उन्हें सम्मानपूर्वक “उस्ताद” कहा जाता है। उन्होंने “पंचपरगनिया सांस्कृतिक मंच” की स्थापना की।  
- लोक संगीत में उन्होंने भदुरिया, डमकच, झुमइर, बारहमासिया, टुसू और सोहराय जैसे गीतों को संरक्षित किया। उन्होंने 14 ऑडियो कैसेट और मनसा मंगल का गीति-नाट्य कैसेट तैयार किया।  
- आधुनिक संगीत में उन्होंने भोजपुरी, पंचपरगनिया और नागपुरी फिल्मों में गीत लिखे और संगीत दिया।  
- वे तबला, नाल, हारमोनियम, गिटार, ड्रम और सिंथेसाइज़र जैसे वाद्य यंत्रों के कुशल वादक हैं।  

सम्मान और पुरस्कार

उनके योगदान को देखते हुए उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए:  
- 1980: श्री लक्ष्मी नारायण कला मंदिर, पटना द्वारा सम्मानित  
- 1996: जिला स्तरीय लोकगीत प्रतियोगिता में प्रथम स्थान  
- 2005: बुंडू अनुमंडल गौरव सम्मान और पाँचपरगना गौरव सम्मान  
- 2010-11: झारखंड सरकार के कला-संस्कृति विभाग द्वारा सम्मानित  
- 2017: अखड़ा सम्मान (झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा)  

निष्कर्ष

राजकिशोर सिंह ने अपनी लेखनी और संगीत साधना से पंचपरगनिया साहित्य और संस्कृति को नई ऊँचाइयाँ दीं। उन्होंने साहित्य और लोककला को एक सूत्र में बाँधकर पंचपरगना की पहचान को सुदृढ़ किया। उनके योगदान के लिए पंचपरगना समाज सदैव उनका ऋणी रहेगा।  

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