टुलू नायक

टुलू नायक : पंचपरगनिया साहित्य की पहली महिला संस्मरण लेखिका

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

1956 में राँची ज़िले के बुंडू परगना के नवरात्री टोली में टुलू नायक का जन्म हुआ। पिता का नाम बिल्लेश्वर नायक और माता का नाम कमला देवी था। वे छह बेटियों में सबसे छोटी थीं और परिवार की लाडली संतान थीं। गरीबी से जूझते हुए भी उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। प्रारंभिक पढ़ाई गाँव के विद्यालय से हुई, आगे बुंडू कन्या उच्च विद्यालय से मैट्रिक (1974) उत्तीर्ण किया।  

1975 में उन्होंने बुंडू कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण पढ़ाई जारी रखना मुश्किल हो गया। उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर आई.ए. की पढ़ाई पूरी की और बाद में रातू में शिक्षक प्रशिक्षण (1976-78) किया। दुर्भाग्यवश नौकरी नहीं मिली और ट्यूशन, सिलाई-कढ़ाई ही उनकी आजीविका बनी।  

विवाह और साहित्यिक जागरण

1981 में उनका विवाह पंचपरगना के प्रसिद्ध साहित्यकार और संगीतकार राजकिशोर सिंह से हुआ। घर में साहित्यिक वातावरण मिलने से उनका मन भी लेखन की ओर आकृष्ट हुआ। उन्होंने प्रौढ़ शिक्षा अभियान में सक्रिय योगदान दिया और शिक्षा की अलख जगाई।  

सामाजिक और साहित्यिक योगदान

सरकारी नियुक्ति न मिलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। 1990 में वे ‘बाल विकास परियोजना’ के तहत आंगनबाड़ी सेविका नियुक्त हुईं। इसके बाद उन्होंने हिंदी, नागपुरी, पंचपरगनिया और भोजपुरी भाषाओं में गीत, कविता, नाटक और संस्मरण लिखना शुरू किया। विभागीय प्रचार के लिए उन्होंने नुक्कड़ नाटक और गीत भी रचे।  

प्रमुख रचनाएँ

टुलू नायक पंचपरगनिया साहित्य की पहली महिला संस्मरण लेखिका हैं। उनकी तीन प्रमुख संस्मरण कृतियाँ हैं:  

1. मायें हयेक दरद  

2. कलह सास-पुतउ केर  

3. राम राखे त मारे के  

इनकी शैली इतनी प्रभावशाली रही कि इन्हें मैट्रिक पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। उनकी रचनाएँ बिहान पत्रिका में भी प्रकाशित हुईं। गद्य साहित्य में उनका योगदान पद्य की तुलना में अधिक सशक्त माना जाता है।  

सम्मान और उपलब्धियाँ

27 वर्षों की सेवा में उन्होंने गाँव-गाँव में शिक्षा और जागरूकता का प्रसार किया। उनके कार्यों के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले:  

- बाल विकास मंत्रालय द्वारा “सम्पूर्ण टीकाकरण सम्मान”  

- यूनिसेफ द्वारा 2004 में “स्तनपान सम्मान”  

- झारखंड सरकार द्वारा 2005 में “राजकीय सम्मान”  

- मानव कल्याण विभाग द्वारा 2005 में “झारखंड की बेस्ट सेविका”  

विरासत

टुलू नायक ने अपने जीवन में सेवा और साहित्य दोनों को समान महत्व दिया। उन्होंने पंचपरगनिया साहित्य में महिलाओं की भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया और अपनी रचनाओं से एक बड़े खालीपन को भरा। आज पूरा पंचपरगना समाज उनकी नई कृतियों की प्रतीक्षा करता है और उनके योगदान को सदैव स्मरण करेगा।  


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