झारखण्ड लोक सेवा आयोग (JPSC)
मुख्य परीक्षा द्वितीय पत्र (Paper-II)
पंचपरगनिया भाषा-साहित्य
Complete Syllabus
खण्ड-।:
भाग (क) — भाषा विज्ञान एवं व्याकरण
(I) पंचपरगनिया भाषा का उद्भव और विकास
उद्भव: यह भाषा भारोपीय भाषा परिवार (Indo-Aryan Family) के अंतर्गत मागधी अपभ्रंश से विकसित हुई है।
भौगोलिक विस्तार: यह मुख्य रूप से झारखण्ड के 'पंचपरगना' क्षेत्र (बुंडू, तमाड़, राहे, सोनाहातु और सिल्ली) में बोली जाती है।
विकास यात्रा: आदि काल में यह विशुद्ध लोकभाषा थी। मध्यकाल में वैष्णव भक्ति आंदोलन (विशेषकर कवि बिनंदिया के पद) के दौरान इसका साहित्यिक विकास हुआ। आधुनिक काल में इसमें गद्य, नाटक और पत्र-पत्रिकाओं का लेखन तेजी से बढ़ा है।
(II) पंचपरगनिया भाषा की विशेषताएँ
ध्वन्यात्मक विशेषताएँ: इसमें 'श', 'ष', 'स' के स्थान पर केवल 'स' का प्रयोग होता है। 'व' ध्वनि अक्सर 'ब' या 'उ' में बदल जाती है (जैसे- विचार -> बिसार)।
सरलता: इसमें महाप्राण ध्वनियों की तुलना में अल्पप्राण ध्वनियों का प्रयोग अधिक होता है, जिससे यह सुनने में मधुर और सरल लगती है।
मिश्रित प्रकृति: इस पर बांग्ला, ओड़िया और नागपुरी भाषाओं का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
(III) पंचपरगनिया भाषा का व्याकरण (संक्षिप्त गाइड)
संज्ञा (Noun): किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान के नाम को कहते हैं। इसके 5 भेद हैं (जैसे- गरु, बुंडू)।
सर्वनाम (Pronoun): संज्ञा के बदले आने वाले शब्द। जैसे- मोइ (मैं), तोइ (तू), उ (वह)।
वचन (Number): केवल दो वचन होते हैं— एकवचन और बहुवचन। बहुवचन बनाने के लिए '-मइला', '-गुला' या '-सब' जोड़ा जाता है (जैसे- छुआ -> छुआमइला)।
लिंग (Gender): दो लिंग होते हैं— पुलिंग और स्त्रीलिंग। बेजान वस्तुओं के लिए कोई अलग नपुंसक लिंग नहीं होता। स्त्रीलिंग बनाने के लिए '-ई' या '-इन' प्रत्यय लगाते हैं (जैसे- बाम्हन -> बाम्हनी)।
काल (Tense): वर्तमान, भूत और भविष्य। क्रिया के अंत में 'है', 'रहे', 'तहे' आदि जुड़ता है।
समास (Compound): शब्दों को संक्षिप्त करना। इसमें अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व और बहुब्रीहि समास होते हैं।
(IV) शब्द गठन, वाक्य संरचना एवं क्षेत्रीय रूप [5]
शब्द गठन: तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज शब्दों का मेल है। सदानों की भाषा होने के कारण इसमें देशज शब्दों की बहुलता है।
वाक्य संरचना: आमतौर पर वाक्य का क्रम कर्ता + कर्म + क्रिया (Subject + Object + Verb) होता है।
क्षेत्रीय रूप: तमाड़ क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा पर मुंडारी का प्रभाव है, जबकि सिल्ली-राहे क्षेत्र की भाषा पर बांग्ला का प्रभाव अधिक दिखता है।
(V) देवनागरी लिपि का उद्भव और विकास
उद्भव: देवनागरी का विकास प्राचीन ब्राह्मी लिपि से गुप्त लिपि और कुटिल लिपि के माध्यम से हुआ है।
विशेषताएँ: यह एक वैज्ञानिक और अक्षरात्मक (Syllabic) लिपि है। इसमें जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है। पंचपरगनिया भाषा को लिखने के लिए वर्तमान में इसी लिपि का प्रयोग प्रामाणिक रूप से किया जाता है।
(VI) सहोदर भाषाएँ एवं सम्बन्ध
सहोदर भाषाएँ: नागपुरी, खोरठा और कुरमाली इसकी सहोदर (बहन) भाषाएँ हैं। ये सभी झारखण्ड की 'सदानी' भाषाएँ हैं।
सम्बन्ध: इन चारों भाषाओं की व्याकरणिक संरचना, क्रिया रूप और शब्दावली में 60% से अधिक समानता पाई जाती है। सभी का जन्म मागधी अपभ्रंश से हुआ है।
भाग (ख) — पंचपरगनिया लोक साहित्य
(I) पंचपरगनिया लोक साहित्य का परिचय एवं प्रकृति चित्रण
सामान्य परिचय: यह साहित्य अलिखित और मौखिक परंपरा पर आधारित है। यह पंचपरगना के जनमानस के सुख-दुख, संस्कृति और परंपराओं का दर्पण है।
प्रकृति चित्रण: यहाँ के लोक साहित्य में प्रकृति (करम पेड़, साल के जंगल, सुवर्णरेखा नदी, हाथी-घोड़ा) को एक सजीव पात्र के रूप में चित्रित किया गया है। मानव जीवन और प्रकृति का गहरा जुड़ाव हर विधा में झलकता है।
(II) पंचपरगनिया लोकगीत (जीवन दर्शन और शिल्प)
जीवन दर्शन: लोकगीतों में जीवन की नश्वरता, कर्म की प्रधानता, और सामूहिक उल्लास का दर्शन मिलता है।
प्रमुख लोकगीत:
बिहा गित (विवाह गीत): शादी के अलग-अलग रस्मों (मड़वा, हल्दी, बिदाई) पर गाए जाने वाले अत्यंत भावुक गीत।
सहरइ गित (सोहराय गीत): पशु धन की पूजा, गोवर्धन पूजा और कृषि संस्कृति से जुड़े गीत। इसमें 'चुमाओन' के गीत मुख्य हैं।
करम गित: भाई-बहन के प्रेम और प्रकृति की पूजा पर आधारित भादों महीने में गाए जाने वाले नृत्य-गीत।
पुस गित (टुसू गीत): पूस के महीने में मकर संक्रांति के अवसर पर टुसू थापना और विसर्जन के समय गाए जाने वाले सामूहिक गीत।
(III) पंचपरगनिया लोक कथाएँ
उद्भव और विकास: ये कथाएँ पीढ़ियों से नानी-दादी की कहानियों के माध्यम से आगे बढ़ी हैं। इनका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ नैतिक शिक्षा देना रहा है।
मुख्य भेद:
सृष्टि कथाएँ: पृथ्वी, मनुष्य और जीव-जंतुओं के जन्म से जुड़ी काल्पनिक व पारंपरिक कहानियाँ।
देव-देवि कथाएँ: स्थानीय देवी-देवताओं के चमत्कार और उनकी पूजा की शुरुआत से जुड़ी कथाएँ।
गोत्र कथाएँ: विभिन्न जातियों और जनजातियों के गोत्र (टोटेम) के उद्भव और उनके पीछे के रहस्यों की कहानियाँ।
भाई-बहन की कथाएँ: भाई-बहन के अटूट त्याग और स्नेह पर आधारित भावुक कहानियाँ (जैसे- करम-धरम की कथा)।
पेड़-पौधे एवं जीव-जंतु की कथाएँ: सियार, बाघ, कौआ और चालाक बंदरों के माध्यम से समाज की विसंगतियों पर व्यंग्य करने वाली शिक्षाप्रद कहानियाँ।
भाग (ग) — पंचपरगनिया भाषा में शिष्ट साहित्य
(I) पंचपरगनिया साहित्य का काल विभाजन
पंचपरगनिया साहित्य के इतिहास को चार मुख्य भागों में बांटा गया है:
आदिकाल: शुरुआती दौर, जिसमें मुख्य रूप से मौखिक लोक साहित्य और शुरुआती रचनाएं शामिल हैं।
मध्यकाल: इस काल में भक्ति आंदोलन का प्रभाव रहा। कवि बरजू राम जैसे प्रमुख कवियों की रचनाएं इसी दौर की हैं।
आधुनिक काल: साहित्य में सामाजिक चेतना, देशभक्ति और आधुनिक विषयों का समावेश हुआ।
अत्याधुनिक काल: समकालीन दौर, जिसमें आज के दौर की समस्याओं और नई शैलियों में लिखा जा रहा है।
(II) पंचपरगनिया पद्य (Poetry) साहित्य
इसके अंतर्गत पद्य की अलग-अलग विधाओं के इतिहास और विकास को पढ़ा जाता है:
गीत: पारंपरिक लोकगीत (झूमर, बिहा, डमकच) और आधुनिक गीत।
कविता: छंदबद्ध और मुक्तक छंद में लिखी गई रचनाएं।
खण्ड काव्य: किसी महान चरित्र या घटना के एक हिस्से पर आधारित सीमित काव्य।
महाकाव्य: विस्तृत और बड़े पैमाने पर लिखा गया प्रबंध काव्य।
(III) पंचपरगनिया गद्य (Prose) साहित्य
गद्य विधा के विकास के तहत इन 10 रूपों का अध्ययन किया जाता है:
कहानी: लघु और दीर्घ कथाएं।
उपन्यास: लंबी काल्पनिक या सामाजिक कथाएं।
नाटक: मंच पर खेले जाने वाले संवाद-प्रधान नाटक।
आत्मकथा: लेखकों द्वारा स्वयं के जीवन का लिखा गया इतिहास।
** जीवनी:** किसी अन्य महान व्यक्ति के जीवन पर आधारित लेखन।
यात्रा वृतान्त: यात्रा के अनुभवों का रोचक वर्णन।
निबंध: किसी विषय पर लेखकों के विचारात्मक निबंध।
संस्मरण: यादों के आधार पर लिखा गया साहित्य।
रेखा चित्र: शब्दों के माध्यम से किसी व्यक्ति या दृश्य का चित्र खींचना।
आलोचना: साहित्य की समीक्षा और गुण-दोष की परख।
(IV) सप्रसंग व्याख्या (Explanation with Context)
परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण खंड है:
पद्य अंश (10 अंक): कविता या गीत की कुछ पंक्तियाँ दी जाएंगी। आपको उसका संदर्भ (कवि और कविता का नाम) बताते हुए अर्थ लिखना होगा।
गद्य अंश (10 अंक): कहानी, निबंध या नाटक का एक गद्यांश दिया जाएगा। इसकी भी संदर्भ सहित व्याख्या करनी होगी।
खण्ड-II :
भाग (घ) — पंचपरगनिया साहित्यकार एवं साहित्य
1. पंचपरगनिया साहित्य पर अन्य साहित्यों का प्रभाव
पंचपरगनिया भाषा झारखंड की एक प्रमुख क्षेत्रीय भाषा है。 इसके विकास में अन्य भारतीय भाषाओं—विशेषकर बांग्ला, उड़िया, हिंदी (खड़ी बोली), और नागपुरी—का गहरा प्रभाव रहा है。 सांस्कृतिक और भौगोलिक निकटता के कारण इन भाषाओं के शब्द, छंद, और साहित्यिक विधाएँ पंचपरगनिया में समाहित हो गईं। विशेषकर बंगाली साहित्य के 'कीर्तन' और 'पदাবলী' परंपरा का इस साहित्य पर गहरा असर है
2. प्रमुख साहित्यकार और उनकी कृतियाँ
बरजुराम: इन्हें पंचपरगनिया साहित्य का प्रथम महाकवि माना जाता है। इनकी प्रमुख रचना 'रामायण' (पंचपरगनिया में) और विविध गीत हैं।
भवप्रीतानन्द ओझा: ये भक्ति धारा के प्रमुख कवि थे। इनकी रचनाओं में सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना झलकती है।
रामकृष्ण गांगुली: साहित्य सृजन में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
विनन्द सिंह: इन्होंने पंचपरगनिया लोकगीतों और कविताओं को सहेजने का कार्य किया।
ज्योतिलाल माहादानी: ये आधुनिक काल के प्रमुख साहित्यकार हैं, जिन्होंने भाषा को नई दिशा दी।
परमानन्द महतो: इनकी कविताओं में लोक-संस्कृति और यथार्थ का सुंदर चित्रण है।
राज किशोर सिंह: ये एक प्रतिष्ठित नाटककार और लेखक हैं। इनकी रचनाओं में सामाजिक और समसामयिक विषयों की प्रधानता होती है।
सृष्टिधर महतो: भाषा के व्याकरण और साहित्य के संकलन में इनका उल्लेखनीय योगदान है।
दीनबन्धु महतो: इन्होंने पंचपरगनिया पद्य और गद्य को समृद्ध किया है।
संतोष साहु प्रीतम: आधुनिक काल के सशक्त हस्ताक्षर, जिनकी कविताओं में समकालीन चेतना और विद्रोह का स्वर है।
भाग (ड.) — पंचपरगनिया निबंध (देवनागरी लिपि)
परीक्षा की दृष्टि से आपको इन विषयों पर देवनागरी लिपि में विश्लेषणात्मक निबंध तैयार करने होंगे :
सम-सामयिक विषय: झारखंड की वर्तमान राजनीति, डिजिटल युग, या युवा और रोजगार से जुड़े ज्वलंत मुद्दे।
सांस्कृतिक विषय: झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, 'टुसू पर्व', 'सोहराई' और सरहुल का महत्व।
सामाजिक विषय: शिक्षा का प्रसार, नारी सशक्तीकरण, और पंचपरगनिया समाज में व्याप्त कुरीतियों का निवारण।
पारंपरिक कलाएँ: 'छऊ नृत्य', 'पैका नृत्य', और हस्तशिल्प कला का संरक्षण व विकास।
आर्थिक विषय: झारखंड की अर्थव्यवस्था, कृषि की स्थिति, और कुटीर उद्योगों की भूमिका।
भौगोलिक विषय: झारखंड की भौगोलिक स्थिति, जलवायु परिवर्तन, और वनों का महत्व।
भाग (च) — पंचपरगनिया संक्षेपण (Precis Writing)
प्रक्रिया: दिए गए एक विस्तृत गद्यांश (पैराग्राफ) को ध्यानपूर्वक पढ़कर उसका मूल भाव समझना होता है。
आवश्यकताएँ:
गद्यांश का एक उपयुक्त, संक्षिप्त और सटीक शीर्षक लिखना。
मूल गद्यांश के लगभग एक-तिहाई ( ) शब्दों में सार या संक्षेपण तैयार करना।
भाषा व्याकरण सम्मत और पंचपरगनिया की अपनी लिपि/देवनागरी में होनी चाहिए।
भाग (छ) — पंचपरगनिया भाषा अनुवाद (Translation)
प्रक्रिया: इस भाग में आपको एक दिए गए हिंदी गद्यांश का सटीक पंचपरगनिया भाषा में अनुवाद करना होता है。
आवश्यकताएँ:
अनुवाद करते समय मूल अर्थ और भाव नहीं बदलना चाहिए।
पंचपरगनिया के मुहावरों, लोकोक्तियों और सटीक शब्दावली (Vocabulary) का प्रयोग आवश्यक होता है, जिससे अनुवाद स्वाभाविक लगे।
भाग (ज) — अवतरण/अनुच्छेद (Comprehension Passages)
प्रक्रिया: परीक्षा में एक गद्यांश दिया जाता है, जिसे पढ़कर आपको तीन प्रश्नों के उत्तर पंचपरगनिया भाषा में ही देने होते हैं。
आवश्यकताएँ:
प्रश्नों के उत्तर हमेशा गद्यांश के संदर्भ में दें。
उत्तरों को सीधा गद्यांश से कॉपी करने के बजाय अपनी भाषा में, स्पष्ट और व्याकरण के नियमों के अनुसार लिखें।
परीक्षा रणनीति: इन तीनों खंडों में उच्च अंक प्राप्त करने के लिए पंचपरगनिया व्याकरण (जैसे- संज्ञा, सर्वनाम, काल और वाक्य-विन्यास) का निरंतर अभ्यास और स्थानीय शब्दावली पर मजबूत पकड़ होना आवश्यक है। विस्तृत पाठ्यक्रम के लिए देखें।
