भारत के 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने हमें एक गहरी सच्चाई याद दिलाई: भारत केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की जन्मभूमि भी है। यह अभिव्यक्ति हमारे प्राचीन इतिहास और आधुनिक यात्रा दोनों को जोड़ती है—जहाँ सदियों से सामूहिक निर्णय लेने की परंपरा रही है और आज हमारा संविधान उस जीवंत आत्मा का प्रतीक है।
🏛️ संविधान: हमारी आधारशिला
राष्ट्रपति ने संविधान को “दुनिया के सबसे बड़े गणराज्य का आधारभूत दस्तावेज़” बताया। यह केवल कानूनी ग्रंथ नहीं है, बल्कि एक नैतिक दिशा-निर्देशक है जो:
- जनता की संप्रभुता को सर्वोच्च स्थान देता है।
- समानता और न्याय की गारंटी करता है।
- मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों के माध्यम से स्वतंत्रता और जिम्मेदारी सुनिश्चित करता है।
- समाज और अर्थव्यवस्था में न्याय के लिए नीति-निर्देशक सिद्धांत प्रदान करता है।
हर गणतंत्र दिवस हमें याद दिलाता है कि यह दस्तावेज़ स्थिर नहीं है, बल्कि जीवंत है—और 140 करोड़ नागरिकों की आकांक्षाओं के साथ निरंतर विकसित हो रहा है।
🌿 लोकतांत्रिक परंपराओं की निरंतरता
भारत का लोकतंत्र केवल अपने आकार के कारण अद्वितीय नहीं है, बल्कि अपनी दृढ़ता और विविधता के कारण भी है। भाषाओं, धर्मों और क्षेत्रों की विशाल विविधता के बावजूद हमारी संस्थाएँ टिकाऊ और सशक्त बनी रही हैं।
प्राचीन सभाओं और समितियों से लेकर आधुनिक संसद तक, सामूहिक शासन की भावना हमेशा हमारी संस्कृति का हिस्सा रही है। राष्ट्रपति के शब्द इस बात पर बल देते हैं कि भारत में लोकतंत्र कोई उधार लिया हुआ विचार नहीं है, बल्कि यह हमारी सभ्यता की धरोहर है।
✨ आज के समय में महत्व
आज जब दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा हो रही है, भारत का उदाहरण प्रेरणादायक है। हमारा संविधान हमें एक सूत्र में बाँधता है और याद दिलाता है कि विविधता में एकता केवल नारा नहीं, बल्कि हमारे गणराज्य का सार है।
गणतंत्र दिवस मनाते हुए हम इन मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं, ताकि लोकतंत्र की यह जन्मभूमि आने वाली पीढ़ियों को भी दिशा देती रहे।
