डॉ. अम्बिका स्वाँसी : पंचपरगनिया साहित्य के आधुनिक हस्ताक्षर
जीवन परिचय और शिक्षा
18 जनवरी 1976 को राँची ज़िले के तमाड़ प्रखंड के उलिडीह गाँव में डॉ. अम्बिका स्वाँसी का जन्म हुआ। पिता का नाम गुरूदयाल स्वाँसी और माता का नाम जयमनी देवी था। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी।
- प्रारंभिक शिक्षा गाँव के विद्यालय से हुई।
- 1990 में मैट्रिक, 1992 में इंटरमीडिएट, और 1995 में बी.ए. उत्तीर्ण किया।
- 2003 में राँची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग से पंचपरगनिया में एम.ए. किया।
- 2005 में UGC-NET उत्तीर्ण कर पंचपरगनिया भाषा में तीसरे NET धारक बने।
- 2013 में “पंचपरगनिया लोकगीतों में जनजीवन” विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान
अम्बिका स्वाँसी ने पंचपरगनिया लोकगीतों, लोककथाओं और संस्कृति पर गहन शोध किया।
- उन्होंने सहरई गीत, विवाह गीत, संस्कार गीत, टुसू गीत आदि का संकलन किया।
- 2012 में दैनिक जागरण में “पाँचपरगना में नचनी नाच की लोकप्रियता” और “नटुआ नाच” पर लेख प्रकाशित हुए।
- 2014 में उनकी चार पुस्तकें प्रकाशित हुईं:
1. पंचपरगनिया लोकगीतों में जनजीवन (पीएच.डी. शोध प्रबंध)
2. पंचपरगनिया लोकगीत
3. पंचपरगनिया बाउल गीत
4. नुपूर (ज्योतिलाल महादानी की रचनाओं का पंचपरगनिया अनुवाद)
शोध आलेख और अकादमिक योगदान
उन्होंने अनेक शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित किए, जैसे:
- पंचपरगनिया लोकगीतों में धार्मिक चित्रण
- पारिवारिक सम्बन्ध की परम्परा
- ऋतु के आधार पर पंचपरगनिया लोकगीतों में जनजीवन
- आदिवासी भाषा तथा साहित्य का विकास
उनके आलेख महाराष्ट्र, बंगाल और असम तक प्रकाशित हुए। संगीता साइकिआ द्वारा संपादित पुस्तक Studies in Globalization and Tribal Life in India में उनका अंग्रेज़ी आलेख The Development of the Adivasi Language and Literature शामिल है।
सामाजिक और सांस्कृतिक सक्रियता
वे निरंतर सेमिनार और सम्मेलनों में भाग लेते रहे हैं।
- ग्लोबलाइजेशन और आदिवासी भाषा-साहित्य पर प्रभाव (शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय)
- आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रयोग और परिवर्तन (राँची विश्वविद्यालय)
- पंचपरगनिया गद्य साहित्य में राष्ट्रीय चेतना (जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग)
विरासत और सम्मान
डॉ. अम्बिका स्वाँसी ने पंचपरगनिया साहित्य को आधुनिक दृष्टि दी और इसे अकादमिक शोध के स्तर तक पहुँचाया। उनकी रचनाएँ पंचपरगनिया भाषा के लिए मील का पत्थर हैं। वे वर्तमान में सरकारी शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं और उनकी रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी राँची से भी होता रहा है।
