रामदयाल मुंडा

रामदयाल मुंडा
डॉ. रामदयाल मुंडा : आदिवासी संस्कृति के युगपुरुष मूल मंत्र और पहचान “जे नाची से बांची” (जो नाचेगा, वही बचेगा) डॉ. रामदयाल मुंडा का जीवन मंत्र था, जिसने झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश और विदेश में आदिवासी संस्कृति को नई पहचान दिलाई। वे केवल भाषाविद्, समाजशास्त्री और आदिवासी विचारक ही नहीं थे, बल्कि स्वयं एक उत्कृष्ट कलाकार भी थे। उन्होंने मुंडारी, नागपुरी, पंचपरगनिया, हिंदी और अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में गद्य-पद्य की रचना की और झारखंड की लोककला, विशेषकर पइका नाच, को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित किया।   प्रारंभिक जीवन और शिक्षा 23 अगस्त 1939 को राँची ज़िले के तमाड़ प्रखंड के दिउड़ी गाँव में उनका जन्म हुआ। पिता का नाम गंदल मुंडा और माता का नाम लोकमा मुंडा था। प्रारंभिक शिक्षा आमलेसा लूथरन मिशन स्कूल (1947-53) से हुई। माध्यमिक शिक्षा खूंटी हाई स्कूल (1953-57) से पूरी की। इसके बाद राँची विश्वविद्यालय से मानव विज्ञान में एम.ए. (1957-63) किया। उच्च शिक्षा के लिए वे अमेरिका गए और शिकागो विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान में पीएच.डी. (1963-68) प्राप्त की।   अकादमिक और अंतर्राष्ट्रीय सफर उन्होंने अमेरिका …