यशोदा देवी : पंचपरगनिया साहित्य की सशक्त महिला स्वर
परिचय और योगदान
पंचपरगनिया साहित्य में यशोदा देवी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी रचनाएँ उस समय सामने आईं, जब आधुनिक पंचपरगनिया साहित्य को नए विचारों और सशक्त अभिव्यक्ति की आवश्यकता थी। चुनिंदा महिला रचनाकारों में उनकी रचनाएँ शिक्षा के प्रति जागरूकता जगाने, लोक मनोरंजन करने और भ्रष्ट व्यवस्था पर तीखा प्रहार करने के लिए जानी जाती हैं।
जीवन परिचय और शिक्षा
1962 में दिंदली, खेदुवाडीह में यशोदा देवी का जन्म हुआ। पिता बीरबल महतो एक प्रसिद्ध शिक्षक थे, जबकि माता सरस्वती देवी केवल चौथी कक्षा तक ही पढ़ सकीं। यशोदा देवी ने नौवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की और फिर 1978 में उनका विवाह तमाड़ के रागड़ाबाड़ांग निवासी चन्द्रमोहन महतो से हुआ। चन्द्रमोहन महतो स्वयं पंचपरगनिया साहित्य के प्रतिष्ठित लेखक और पंचपरगना किसान महाविद्यालय, बुंडू में व्याख्याता हैं। विवाह के बाद साहित्यिक वातावरण मिलने से यशोदा देवी भी लेखन की ओर प्रेरित हुईं।
साहित्यिक यात्रा और प्रमुख रचनाएँ
उन्होंने पंचपरगनिया, कुड़माली और मुंडारी भाषाओं का ज्ञान होने के बावजूद अपनी रचनाओं के लिए पंचपरगनिया को ही माध्यम बनाया।
- गद्य-पद्य संग्रह में उनकी लोककथा “सियार केर फेउ” प्रकाशित हुई।
- बिहान पत्रिका में उनका निबंध “बेस डहर” छपा।
- दुइ डाइर बारो बरन फुल पुस्तक में उनकी कविता “गरहन” प्रकाशित हुई।
विषयवस्तु और चिंतन
उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार और भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार मिलता है।
- “बेस डहर” निबंध में उन्होंने भ्रष्टाचार को राक्षस की संज्ञा दी और बताया कि यह जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य का पीछा करता है। उन्होंने आम जनता से सहयोग की अपील की ताकि भ्रष्टाचार मुक्त समाज का निर्माण हो सके।
- “गरहन” कविता में उन्होंने भाईचारे और एकता का संदेश दिया। रावण के विनाश का उदाहरण देकर उन्होंने बताया कि आपसी फूट समाज को कमजोर करती है।
विशेषताएँ
यशोदा देवी की लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है— किसी भी समस्या की जड़ तक पहुँचना और उसे सरल शब्दों में गहनता के साथ प्रस्तुत करना। उनकी रचनाएँ समाज के हर वर्ग को छूती हैं— बच्चे, स्त्री, पुरुष, गरीब और अमीर सभी उनके चिंतन का हिस्सा हैं।
निष्कर्ष
यशोदा देवी पंचपरगनिया साहित्य की चिंतनशील और सशक्त महिला लेखिका हैं। यद्यपि उनकी रचनाएँ संख्या में कम हैं, किंतु जितनी भी उपलब्ध हैं, वे पंचपरगनिया साहित्य को अपार बल और मजबूती प्रदान करती हैं। उन्होंने महिला लेखन की परंपरा को आगे बढ़ाया और समाज को सही मार्ग दिखाने का कार्य किया।
