संतोष साहू 'प्रीतम' : पंचपरगनिया आधुनिक कहानी साहित्य के शिल्पी
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
3 जुलाई 1952 को अड़की थाना क्षेत्र के पुर्णानगर गाँव में संतोष साहू 'प्रीतम' का जन्म हुआ। पिता का नाम दुखहरन साहू और माता का नाम मोहिनी देवी था। प्रथम संतान होने के कारण उनका नाम ‘संतोष’ रखा गया। प्रारंभिक शिक्षा गाँव के विद्यालय से हुई, आगे की पढ़ाई पुर्णानगर मिडिल स्कूल और खूंटी एस.एस. हाई स्कूल से पूरी की। मैट्रिक में अच्छे अंक प्राप्त करने के बाद वे उच्च शिक्षा हेतु राँची आए।
1970 में उन्होंने आई.ए. और 1973 में हिंदी ऑनर्स के साथ बी.ए. की डिग्री राँची विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उनकी मेधावी प्रतिभा प्रारंभ से ही स्पष्ट थी।
हिंदी साहित्य में साहित्यिक यात्रा
नौकरी और पारिवारिक जीवन के साथ-साथ उनके भीतर का साहित्यकार सदैव सक्रिय रहा। उन्होंने देवी सरस्वती की वंदना से अपनी साहित्यिक यात्रा आरंभ की और कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास तथा निबंध जैसी सभी विधाओं में लेखन किया।
उनकी प्रमुख हिंदी रचनाएँ हैं:
- प्रतिशोध (नाटक)
- तिरस्कार (उपन्यास)
- भावसंकलन (कविता संग्रह)
- बंटा हुआ आदमी (कहानी संग्रह)
- पलाश के फूल (लघु उपन्यास)
उनकी रचनाओं में आधुनिकता और समसामयिकता की झलक मिलती है। आकाशवाणी राँची और रायपुर से उनकी कहानियों का प्रसारण हुआ तथा उन्हें कहानी लेखन प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार भी मिला।
पंचपरगनिया साहित्य का पुनरुद्धार
झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा पंचपरगनिया भाषा को मान्यता मिलने के बाद उनका मातृभाषा प्रेम जागृत हुआ। उन्होंने पंचपरगनिया साहित्य की सेवा का संकल्प लिया।
2005 में उन्होंने अपने खर्च पर पहला पंचपरगनिया कहानी संग्रह “जदि एसन हतक हले का हतक” प्रकाशित किया। इसमें पाँच कहानियाँ हैं, जिनमें समाज की रूढ़ियों पर प्रहार, मातृत्व का चित्रण और नारी की शक्ति का उद्घाटन किया गया है। यह संग्रह इतना लोकप्रिय हुआ कि राँची विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया।
2014 में उनका दूसरा कहानी संग्रह “चिती साँप” प्रकाशित हुआ, जिसमें बीस कहानियाँ और एक यात्रा वृत्तांत सम्मिलित हैं। इन कहानियों को आधुनिक पंचपरगनिया साहित्य का मील का पत्थर माना जाता है। उनकी लेखन शैली की तुलना प्रेमचंद, उदय प्रकाश, मन्नू भंडारी और धर्मवीर भारती जैसे साहित्यकारों से की गई है।
2015 में उनका पहला निबंध संग्रह “परथम बिसुस’ जुइध केर एक सो साल” प्रकाशित हुआ, जिसमें राष्ट्र और देशभक्ति से जुड़े आठ निबंध हैं। यह संग्रह उन्हें एक सफल निबंधकार के रूप में स्थापित करता है।
विरासत और निष्कर्ष
संतोष साहू 'प्रीतम' ने पंचपरगनिया साहित्य को आधुनिक कहानियों और निबंधों के माध्यम से नई दिशा दी। उन्होंने पाठकों को लोककथाओं के बंधन से मुक्त कर समसामयिक समस्याओं की ओर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया।
उनकी रचनाओं में वेदना, विद्रोह और देशभक्ति का स्वर स्पष्ट दिखाई देता है। पंचपरगना समाज उनके इस योगदान के लिए सदैव ऋणी रहेगा और भविष्य में उनके संस्मरण, नाटक और महाकाव्य जैसी रचनाओं की प्रतीक्षा करेगा।
