गोपाल कृष्ण गोखले (Gopal Krishna Gokhale)
गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उदारवादी चरण (Moderate Phase) के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। वे एक समाज सुधारक, शिक्षाविद और एक आदर्श संसदीय राजनीतिज्ञ थे।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा (Early Life and Education)
* जन्म: 9 मई, 1866 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के एक छोटे से गाँव 'कोटलुक' में हुआ।
* शिक्षा: 1884 में उन्होंने बॉम्बे के एलफिंस्टन कॉलेज (Elphinstone College) से स्नातक किया।
* वैचारिक प्रभाव: वे पश्चिमी राजनीतिक विचारों से गहराई से प्रभावित थे। विशेष रूप से, वे जॉन स्टुअर्ट मिल (J.S. Mill) और एडमंड बर्क (Edmund Burke) के उदारवादी दर्शन के प्रशंसक थे, जिसने उनकी संवैधानिक सोच को आकार दिया।
* करियर: उन्होंने पुणे के 'न्यू इंग्लिश स्कूल' में एक शिक्षक के रूप में अपना करियर शुरू किया और बाद में प्रतिष्ठित फर्ग्यूसन कॉलेज (Fergusson College) में व्याख्याता (Lecturer) और फिर प्रिंसिपल बने।
रानाडे का प्रभाव: गुरु-शिष्य परंपरा (Influence of Ranade)
गोखले के जीवन पर सबसे गहरा प्रभाव जस्टिस एम.जी. रानाडे (Mahadev Govind Ranade) का पड़ा।
* गोखले रानाडे को अपना गुरु मानते थे।
* रानाडे के मार्गदर्शन में, गोखले ने सार्वजनिक जीवन और समाज सेवा के लिए खुद को समर्पित कर दिया।
* वे 'सार्वजनिक सभा' (Sarvajanik Sabha) के सचिव (Secretary) बने, जो उस समय पुणे का एक प्रमुख राजनीतिक संगठन था।
पत्रकारिता और लेखन (Journalism)
गोखले ने अपने विचारों को फैलाने के लिए पत्रकारिता का सहारा लिया:
* सुधारक (Sudharak): उन्होंने गोपाल गणेश अगरकर द्वारा शुरू की गई पत्रिका 'सुधारक' के अंग्रेजी अनुभाग में कई वर्षों तक लेखन किया।
* त्रैमासिक जर्नल: वे 'सार्वजनिक सभा' की त्रैमासिक पत्रिका (Quarterly Journal) के संपादक भी रहे।
दक्कन सभा की स्थापना (Deccan Sabha - 1896)
यह घटना महाराष्ट्र की राजनीति में 'उदारवादी' और 'उग्रवादी' गुटों के बीच पहले बड़े विभाजन का प्रतीक थी।
* विवाद: 1896 में, बाल गंगाधर तिलक और उनके सहयोगियों ने पुणे सार्वजनिक सभा पर कब्जा कर लिया।
* नई शुरुआत: वैचारिक मतभेदों के कारण, रानाडे और गोखले ने सार्वजनिक सभा छोड़ दी और 1896 में 'दक्कन सभा' (Deccan Sabha) की स्थापना की।
* पद: गोखले इसके पहले सचिव बने।
वेल्बी आयोग (Welby Commission - 1897)
यह गोखले की पहली बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि थी।
* उद्देश्य: ब्रिटिश सरकार ने भारतीय व्यय (Expenditure) और प्रशासन के खर्च की जांच के लिए 'वेल्बी आयोग' का गठन किया था।
* गोखले की भूमिका: दक्कन सभा की ओर से गोखले को गवाही देने के लिए इंग्लैंड भेजा गया। वहां उन्होंने भारतीय वित्त (Indian Finance) पर अपनी पकड़ और तर्कों से ब्रिटिश अधिकारियों को प्रभावित किया। उन्होंने साबित किया कि कैसे प्रशासन का खर्च भारतीयों पर बोझ बन रहा है।
विधायी कार्य: "आदर्श सांसद" (Work in Legislative Councils)
गोखले को भारत का सबसे बेहतरीन सांसद माना जाता है। उन्होंने संसदीय लोकतंत्र की नींव रखी।
* बॉम्बे विधान परिषद (1899): वे पहली बार बॉम्बे काउंसिल के लिए चुने गए।
* इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल (1901): 1901 में वे केंद्रीय विधान परिषद (आज की संसद के समान) के लिए चुने गए और जीवन भर (1915 तक) इसके सदस्य रहे।
* बजट भाषण: उनके बजट भाषण (Budget Speeches) ऐतिहासिक होते थे।
* वे हवा में बातें करने के बजाय, आंकड़ों और तथ्यों के साथ सरकार की आलोचना करते थे।
* उनकी आलोचना इतनी तार्किक और रचनात्मक होती थी कि अंग्रेज वित्त सदस्य भी उनका सम्मान करते थे।
सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी (Servants of India Society - 1905)
यह गोखले का सबसे महान संस्थागत योगदान था।
* स्थापना: 12 जून, 1905 को पुणे में (फर्ग्यूसन कॉलेज छोड़ने के बाद)।
* उद्देश्य: "देश सेवा के लिए समर्पित प्रचारक तैयार करना।"
* सिद्धांत: इसका मानना था कि राष्ट्र निर्माण के लिए निस्वार्थ और बुद्धिमान कार्यकर्ताओं की एक फौज की जरूरत है।
* शपथ: सदस्यों को "त्याग" की शपथ लेनी होती थी—वे निजी स्वार्थ, अहंकार और प्रसिद्धि को त्यागकर, साधारण वेतन पर जीवन भर देश सेवा करते थे।
* कार्य: शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवा, अस्पृश्यता निवारण और महिलाओं का उत्थान।
* हितवाद (Hitavada): 1911 में, सोसाइटी ने नागपुर से 'हितवाद' नामक अंग्रेजी समाचार पत्र शुरू किया।
* गांधीजी और सोसाइटी: गांधीजी गोखले का बहुत सम्मान करते थे और इस सोसाइटी में शामिल होना चाहते थे। लेकिन, गोखले की मृत्यु के बाद अन्य सदस्यों ने गांधीजी को सदस्यता देने से मना कर दिया क्योंकि गांधीजी के विचार (सत्याग्रह) सोसाइटी के उदारवादी तरीकों से मेल नहीं खाते थे।
गिरमिटिया मजदूरों और दक्षिण अफ्रीका में भूमिका (Indentured Labour & South Africa)
* कौंसिल में प्रस्ताव: गांधीजी के अनुरोध पर, गोखले ने इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में नटाल (दक्षिण अफ्रीका) में भारतीय गिरमिटिया मजदूरों (Indentured Labour) की भर्ती रोकने के लिए 1910 और 1912 में प्रस्ताव पेश किए।
* दक्षिण अफ्रीका यात्रा (1912): वे गांधीजी के निमंत्रण पर दक्षिण अफ्रीका गए। वहां उनके कूटनीतिक दबाव के कारण तत्कालीन जनरल स्मट्स को भारतीयों के खिलाफ कुछ काले कानून वापस लेने पड़े।
अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा (Compulsory Primary Education)
गोखले शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की कुंजी मानते थे।
* प्रयास (1910-13): उन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि वह प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और मुफ्त बनाए।
* ऐतिहासिक बिल: 1911 में उन्होंने 'अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा बिल' पेश किया। हालाँकि सरकारी बहुमत के कारण यह बिल गिर गया, लेकिन इसने पहली बार शिक्षा को राज्य की जिम्मेदारी के रूप में स्थापित किया।
महात्मा गांधी के साथ संबंध (Relation with Mahatma Gandhi)
गांधीजी गोखले को अपना "राजनीतिक गुरु" मानते थे।
* धर्मात्मा गोखले: गांधीजी ने गुजराती में गोखले को समर्पित 'धर्मात्मा गोखले' नामक पुस्तक लिखी।
* सलाह: जब 1915 में गांधीजी भारत लौटे, तो गोखले ने ही उन्हें सलाह दी थी: "एक साल तक मुँह बंद रखो और आँख-कान खुले रखो (पूरे भारत का भ्रमण करो)।"
* तुलना (गांधीजी के शब्दों में):
> "सर फिरोजशाह मेहता हिमालय की तरह अभेद्य लगते थे, लोकमान्य तिलक समुद्र की तरह गहरे और विशाल थे, लेकिन गोखले गंगा की तरह थे—पवित्र, निर्मल और जिनके पास कोई भी आसानी से जा सकता था।"
राजनीतिक विचार और विचारधारा (Political Thought)
गोखले एक व्यावहारिक उदारवादी (Pragmatic Liberal) थे।
(क) ब्रिटिश शासन पर विचार
* वे ब्रिटिश शासन को भारत के लिए "ईश्वरीय वरदान" (Providential) मानते थे।
* कारण: उन्हें लगता था कि ब्रिटिश शासन ने भारत को दो चीजें दी हैं: (1) आधुनिकता, और (2) कानून का शासन (Rule of Law)।
* लक्ष्य: वे भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर रहते हुए "स्वशासन" (Self-government within the Empire) दिलाना चाहते थे, जिसे कनाडा/ऑस्ट्रेलिया की तरह 'डोमिनियन स्टेटस' कहा जाता है।
(ख) साधन और साध्य (Means and Ends)
* वे "संवैधानिक आंदोलन" (Constitutional Agitation) में विश्वास करते थे।
* हिंसा, विद्रोह या सीधे टकराव के बजाय, वे अनुनय (Persuasion), तर्क और बातचीत का रास्ता चुनते थे।
(ग) गोखले बनाम तिलक (उदारवादी बनाम उग्रवादी)
यह अंतर समझना महत्वपूर्ण है:
गोखले (उदारवादी)
औपनिवेशिक स्वशासन (Dominion Status)
जनता को पहले स्वराज के "योग्य" बनना होगा।
सहयोग और संवैधानिक सुधार
तिलक (उग्रवादी)
पूर्ण स्वतंत्रता (Complete Independence)
स्वराज जनता का "जन्मसिद्ध अधिकार" है, योग्यता की शर्त नहीं।
निष्क्रिय प्रतिरोध और बहिष्कार
(घ) सरकार की आलोचना
बावजूद इसके कि वे उदारवादी थे, वे सरकार के पिछलग्गू नहीं थे।
* उन्होंने लॉर्ड कर्जन की दमनकारी नीतियों (विशेषकर बंगाल विभाजन) का कड़ा विरोध किया।
* उनका प्रसिद्ध कथन था: "ब्रिटिश राज में 'राज' (शासन) ज्यादा है और 'ब्रिटिश' (मूल्य) कम हैं।" (The British Raj was more raj and less British).
सम्मान और अस्वीकृति (Refusal of Knighthood)
गोखले इतने स्वाभिमानी और निस्वार्थ थे कि उन्होंने व्यक्तिगत सम्मानों को ठुकरा दिया:
* वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने उन्हें 'नाइटहुड' (Knighthood - 'सर' की उपाधि) देने की सिफारिश की थी, जिसे राजा ने मंजूर भी कर लिया था। लेकिन गोखले ने विनम्रतापूर्वक इसे लेने से इनकार कर दिया।
* उन्होंने 'भारत सचिव की परिषद' (Council of Secretary of State) में पद लेने से भी मना कर दिया ताकि वे स्वतंत्र रूप से देश की सेवा कर सकें।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भूमिका
* प्रवेश: 1889 में पहली बार शामिल हुए।
* अध्यक्षता (1905): वे बनारस अधिवेशन (1905) के अध्यक्ष बने। यह बहुत महत्वपूर्ण समय था क्योंकि बंगाल विभाजन के कारण देश में उबाल था।
* मॉर्ले-मिंटो सुधार (1909): इन सुधारों को लाने में गोखले की बातचीत और कूटनीति ने बड़ी भूमिका निभाई थी (हालाँकि बाद में वे इन सुधारों के सांप्रदायिक प्रावधानों से निराश हुए)।
